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मन मस्त हुआ फिर क्या बोले


 मन मस्त हुआ फिर क्या बोले

मन मस्त हुआ फिर क्या बोले
सूरत कलाळी भई मतवाली
मदवा पी गयी बिन तोले
हीरो पायो गांठ गठायो
बार बार बांको क्यों खोले

हल्की थी तब चढ़ी तराजू
पूरी भई बांको क्यों तोले

हंसा पायो मानसरोवर
ताल तलैय्या क्यों डौले

तेरा सायब है तुझ माही
बाहर नैना क्यों खोले

कहत कबीर सुनो भाई साधो
साहेब मिल गये तिल तोले


जय श्री नाथ जी की
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हँस हँस मिठा जग मे बोलानाए,


हँस हँस मिठा जग मे बोलानाए, 
हँस हँस मिठा जग मे बोलानाए,
जग में अमर रह्यो ना कोय
आम फलै नीचा निंव ए
या तो अरण्ड अकाशाँ जाय
बोदी सी बाड बिरान्ठ की ऐ,
बा तो बिन छेडया खिण्ड जाय

नुगराँ माणस की संगत ना करो ए,
ज्याँ से घटे तुम्हारो मान

सुगरा माणस की संगत थे करो ए ,
ज्यासे से बढे तुम्हारो मान

ओछी नाडुल्या जळ ना भरो ए,
के घट में भरियो सुखमण नीर

रानी रूपाँदे री बिनती ए ,
जाँरो सत अमरापुर बास

बोल नाथ जी महाराज की जय
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चादर झीणी राम झीणी

  चादर झीणी राम झीणी 
चादर झीणी राम झीणी, या तो सदा राम रस भीणी॥टेर॥

अष्ट कमल पर चरखो चाले, पाँच तंत की पूणी।

नौ दस मास बणताँ लाग्या, सतगुरु ने बण दीनी॥1॥

जद मेरी चादर बण कर आई, रंग रेजा ने दीनी।
ऐसा रंग रंगा रंगरेजा, लाली लालन कीनी॥2॥
मोह माया को मैल निकाल्या, गहरी निरमल कीनी।
प्रेम प्रीत को रंगलगाकर, सतगुरुवाँ रंग दीनी॥3॥
ध्रुव प्रहलाद सुदामा ने ओढ़ी, सुखदेव ने निर्मल कीनी।
दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी, ज्यू की ज्यू धर दीनी॥4॥ 
जय श्री नाथ जी की

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कोई पीवो राम रस प्यासा

कोई पीवो राम रस प्यासा
कोई पीवो राम रस प्यासा, कोई पीवो राम रस प्यासा।

गगन मण्डल में अमी झरत है, उनमुन के घर बासा॥टेर॥

शीश उतार धरै गुरु आगे, करै न तन की आशा।

एसा मँहगा अमी बीकत है, छः ऋतु बारह मासा॥1॥ 
मोल करे सो छीके दूर से, तोलत छूटे बासा।
 जो पीवे सो जुग जुग जीवे, कब हूँ न होय बिनासा॥2॥ 
एंही रस काज भये नृप योगी, छोडया भोग बिलासा।
 सहज सिंहासन बैठे रहता, भस्ती रमाते उदासा॥3॥
गोरखनाथ, भरथरी पिया, सो ही कबीर अम्यासा।
गुरु दादू परताप कछुयक पाया सुन्दर दासा॥4॥
जय श्री नाथ जी की
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फकीरी अलबेला को खेल

  फकीरी अलबेला को खेल 
कायर सके ना झेल, फकीरी अलबेला को खेल॥टेर॥
ज्यूँ रण माँय लडे नर सूरा, अणियाँ झुक रहना सेल।
गोली नाल जुजरबा चालै, सन्मुख लेवै झेल॥1॥
सती पति संग नीसरी, अपने पिया के गैल।
सुरत लगी अपने साहिब से, अग्नि काया बिच मेल॥2॥
अलल पक्षी ज्यूँ उलटा चाले, बांस भरत नट खेल।
मेरु इक्कीस छेद गढ़ बंका, चढ़गी अगम के महल॥3॥
दो और एक रवे नहीं दूजा, आप आप को खेल।
कहे सामर्थ कोई असल पिछाणै, लेवै गरीबी झेल॥4॥
जय श्री नाथ जी की

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हिण्डो तो घलादे सतगुरु म्हारा बाग मे जी।



हिण्डो तो घलादे सतगुरु म्हारा बाग मे जी।
हिण्डो तो घलादे सतगुरु म्हारा बाग मे जी।
सतगुरु म्हारा, हिण्डे-हिण्डे सुरता नार ॥टेर॥
काया तो नगरिये मे सतगुरु म्हारा आमली जी।
सतगुरु म्हारा छायी छायी च्यारुँ मेर ॥1॥
अगर-चंदन को सतगुरु म्हारा पालणो जी।
सतगुरु म्हारा रेशम डोर घलाय ॥2॥
पाँच सखी मिल पाणीड़े न निसरी जी।
सतगुरु मेरा पाँचू ही एक उणियार ॥3॥
नाथ गुलाब से सतगुरु म्हारा विनती जी।
सतगुरु मेरा गावै-गावै भानीनाथ ॥4॥
बोल नाथ जी महाराज की जय
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म्हारी लगी राम से प्रीत

 म्हारी लगी राम से प्रीत
राणा जी करमा रो संगाती कोई भी नहीं

एक माता का दोय लाडला जी
ज्याका न्यारा न्यारा भाग
एक क सिर पर क्षत्र फिर
दूजो भिक्षा मांग र खाय (
करमा रो संगाती कोई भी नहीं)

एक गऊ का दोय बाछड़ा
ज्यारा न्यारा न्यारा भाग
एक तो शिव जी को नांदियो बणे
दूजो बिणजारा को बैल
(करमा रो संगाती कोई भी नहीं)
एक माटी का दोय घडकला
ज्यारा न्यारा न्यारा भाग
एक तो शिव जी के जल धारा चढ़े
दूजो श्मशाणा म जाय
(करमा रो संगाती कोई भी नहीं)
मीरां तो जलमी मेड़त रे
यो तो राणों गढ़ चितोड़
 
मीरां तो जलमी मेड़ते रे
बाने बेकुंठा का बास
(करमा रो संगाती कोई भी नहीं)

जय श्री नाथ जी की

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सतगुरु साहेब बंदा एक है जी


सतगुरु साहेब बंदा एक है जी
सतगुरु साहेब बंदा एक है जी
भोली साधुडा से किस्योड़ी भिरांत म्हारा बीरा रे
साध रे पियालो रल भेला पिव जी
धोबिड़ा सा धोव गुरु का कपडा रे
कोई तन मन साबण ल्याय म्हारा बिरा रे
तन रे सीला रे मन साबणा रे
ये तो मैला मैला धुप धुप जाय म्हारा बिरा रे
काया रे नगरिये में आमली रे
ज्या पर कोयालड़ी तो करे र किलोल
कोयलडया रे शबद सुहावना रे
बे तो उड़ उड़ लागे गुरु के पाँव म्हारा बिरा रे

काया रे नागरिये में हाटडी रे
ज्या पर बिणज करे साहूकार म्हारा बिरा रे
कई तो करोड़ी धज हो चल्या रे
कई गया ह जमारो हार म्हारा बिरा रे

सीप रे समन्दरिये में निपजे रे
कोई मोतिड़ा तो निपजे सीपा माय म्हारा बिरा रे
बूंद रे पड़ रे हरी के नाम की रे
कोई लखियो बिरला सा साध म्हारा बिरा रे

सतगुरु शबद उचारिया रे
कोई रटीयो साँस म साँस म्हारा बिरा रे
देव रे डूंगरपुरी बोलिया रे
जांका सत अमरापुर बास म्हारा बिरा रे

कृष्णं वन्दे जगत गुरुं
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बलिहारी बलिहारी म्हारे सतगुरुवां ने बलिहारी।


बलिहारी बलिहारी म्हारे सतगुरुवां ने बलिहारी।
बलिहारी बलिहारी म्हारे सतगुरुवां ने बलिहारी।
बन्धन काट किया जीव मुक्ता, और सब विपत बिड़ारी॥टेर॥
वाणी सुनत परस सुख उपज्या, दुर्मति गयी हमारी।
करम-भरम का संशय मेट्या, दिया कपाट उधारी॥1॥
माया, ब्रह्म भेद समझाया, सोंह लिया विचारी।
पूरण ब्रह्म कहे उर अंदर, काहे से देत विड़ारी॥2॥
मौं पर दया करो मेरा सतगुरु, अबके लिया उबारी।
भव सागर से डूबत तार्या, ऐसा पर उपकारी॥3॥
गुरु दादू के चरण कमल पर, रखू शीश उतारी।
और क्या ले आगे रखू, सुन्दर भेट तिहारी॥4॥

बोल नाथ जी महाराज की जय
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तेरा भगत करे अरदास ज्ञान मोहे देना हे काली




तेरा भगत करे अरदास ज्ञान मोहे देना हे काली
तेरा भगत करे अरदास ज्ञान मोहे देना हे काली
मालीडे न बाग लगाया पर्वत हरियाली
तेरे हाथन में पुष्पन की माला द्वार खड्या माली
जरी का दुपट्टा चीर शीश पर सोव जंगाली
तेरे नाकन म नकबेसर सोहे कर्णफूल बाळी

सवा पहर के बिच भवन म खप्पर भर चाली
तू कर दुष्टन का नास भगत की करना रखवाली

चाबत नागर पान होठ पर छाय रही लाली
तने गावे मोतीलाल काळका कलकत्ते वाली


 जगत जननी मय्या की जय
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म्हारा सतगुरु दीन्ही बताय



म्हारा सतगुरु दीन्ही बताय 
म्हारा सतगुरु दीन्ही बताय
दलाली हिरा लालन की
लाल पड़ी चोगान म रे रही कीच लिपटाय
नुगरा ठोकर दे चल्या रे सुगरा न लेई है उठाय
लाल लाल तो सभी कव रे सब के पल्ले लाल
गांठ खोल देखी नहीं रे किस विध भयो कंगाल

मखियाँ बैठी शहद पर रे रही पंख लिपटाय
उड़ने का सांसा भया रे लालच बुरी है बलाय

इधर से अंधा जावता रे उधर से अंधा आय
अंधे को अंधा मिला रे मारग कौन बताय

लाली लाली सभी केवे रे लाली लखी न कोय
लाली लखीयो दास कबीरो आवागमन ना होय

जय श्री नाथ जी की

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कळप मत काछब कुड़ी ए



 कळप मत काछब कुड़ी ए
 कळप मत काछब कुड़ी ए
रमय्ये री बाता रूडी ए
भक्ति का भेद भारी रे
लख कोई संतां का प्यारा
(१)  काछवो काछ्वी रेता समद म
होया हरी का दास
साधू आवत देख के रे
सती नवाया शीश
पकड़ झोळी म घाल्या रे
मरण की अब के बारी रे

(२)  कहे कछ्वी सुण रे काछवा
भाग सके तो भाग
घाल हांडी में चोडसी रे
तळ लगावे आँच
पड्यो हांडी में सीज रे
रूस गयो कृष्ण मुरारी रे

(३)  कहे काछ्वो सुण ए काछवी
मन में धीरज राख
त्यारण वालो त्यारसी रे
सीतापति रघुनाथ
भगत न त्यारण आवे रे
गोविन्दो दोड्यो आवे रे

(४)  कहे काछ्वो सुण रे सांवरा
भव लगादे पार
आज सुरजिया उदय नहीं होवे
आवे अमीरी मोत
भगत की हांसी होव रे
ओळमो आवे थाने रे

(५)  उतराखंड से चली बादळी
इन्द्र रयो घरराय
तीन तूळया रि झोपड़ी रे
चढ़ी आकाशा जाय
पाणी की बूंदा बरसे रे
धरड धड इन्द्र गाजे रे

(६)  किसनाराम की विनती साधो
सुनियो चित्त लगाय
जुग जुग भगत बचाइया रे
आयो भगत के काज
गावे यो जोगी बाणी रे
गावे यो पध निरबाणी रे



जय श्री नाथ जी की
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हर भज हर भज हीरा परख ले,


 
हर भज हर भज हीरा परख ले,
हर भज हर भज हीरा परख ले, समझ पकड़ नर मजबूती ।
अष्ट कमल पर खेलो मेरे दाता, और बारता सब झूठी ॥टेर॥
इन्द्र घटा ज्यूँ म्हारा सतगुरु आया, आँवत ल्याया रंग बूँटी ।
त्रिवेणी के रंग महल में साधा लाला हद लूटी ॥1॥
इण काया में पाँच चोर है, जिनकी पकड़ो सिर चोटी ।
पाँचवाँ ने मार पच्चीसाँ ने बसकर, जद जाणा तेरी बुध मोटी ॥2॥
सत सुमरण का सैल बणाले, ढाल बणाले धीरज की ।
काम, क्रोध ने मार हटा दे, जद जाणा थारी रजपूती ॥3॥
झणमण झणमण बाजा बाजै, झिलमिल झिलमिल वहाँ ज्योति ।
ओंकार के रणोकार में हँसला चुग गया निज मोती ॥4॥
पक्की घड़ी का तोल बणाले, काण ने राखो एक रती ।
शरण मच्छेन्द्र जति गोरक्ष बोल्या, अलख लख्या सो खरा जती ॥5॥


बोल नाथ जी महाराज की जय
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दयो वरदान मुझे भक्ती का जागो शंकर बम लहरी



 दयो वरदान मुझे भक्ती का जागो शंकर बम लहरी ।
दयो वरदान मुझे भक्ती का जागो शंकर बम लहरी ।
अन्न धन का भण्डार खोल दयो सेवा करा मालिक थारी
अंग भभूती ललाट चंद्रमा मुण्डीयन की माला पहरी
बासुकी नाग गले में टूले शीश जटा गंगा बह री
गांजा सुल्फा भाँग धतूरा नशा करे शंकर जहरी
अमल तमाखू भाँग छुन्तरा प्याय रही गौरां प्यारी

भक्ती से वरदान ले लियो तपस्या जाय करी गहरी
भस्मी कड़ो दियो दाने न शिव के गेल हुयो बैरी

आगे शंकर लेर दानो देण लग्या खण्ड में फेरी
गिरिजा रूप धरयो विष्णू न दाने की करदी ढेरी

दस शीश रावण के बकश्या बीस भूजा हस्ती गहरी
विजये का वरदान पायके राम परणी सीता हरी

काशी चेला शिव संकर का पार करो इनकी फेरी
पलक उघाड़ो अन्तर यामी सुमरण का पासा गेरी

झिलल झिलल वालो कूम्हलावे आवन की मत कर देरी
रामजी लाल बिड्द बखाणे सुण भोला करुणा मेरी



जय शंकर शम्भू
जय श्री नाथ जी की


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नम: शिवाय भजता जा

 
नम: शिवाय भजता जा

ॐ शिव ॐ शिव ॐ शिव ॐ शिव , ॐ शिव ॐ शिव रटता जा |
नम: शिवाय नम: शिवाय, नम: शिवाय भजता जा ||
शिव शंकर कैलाशपति है, अंग वभूति रमाते है |
जटाजूट में गंग बिराजै, गंगाधर को रटता जा || नम: शिवाय ||
भांग धतुरा भोग लागत है, गले सर्पो की माला रे |
नंदी की असवारी सोहे, नन्दीश्वर को रटता जा || नम: शिवाय ||

भष्मासुर को भष्म कराया, लीला अपरम्पार तेरी |
मोहिनी रूप धारयो विष्णु ने, लीलाधर को रटता जा || नम: शिवाय ||

गगन मंडल थारी महिमा गावै, गावै नर और नारी रे |
ऐसे दीनदयाल मेरे दाता, भूतनाथ को रटता जा || नम: शिवाय ||

ॐ शिव ॐ शिव ॐ शिव ॐ शिव , ॐ शिव ॐ शिव रटता जा |

जय शंकर की....
जय श्री नाथजी की.....
बोल नाथ जी महाराज की जय हो

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सतगुरु सुल्झावेंगा

सतगुरु सुल्झावेंगा
तेरे गले को हार जंजीरों रे, सतगुरु सुलझावेगा |
तेरे काया नगर में हीरो रे, हेरे से पावैगा ||

कारीगर का पिंजरा रे भाई , तने घडल्यायो करतार |
शायर करसी सोधना रे, मूरख करे रे मरोड़ |
रोष मन मायले में ल्यावेगा || १ ||

मन लोभी मन लालची रे भाई , मन चंचल मन चोर |
मन के मत में न चालिए रे , पलक पलक मन और |
जीव के जाळ घालावणा || २ ||

ऐसा नान्हा चालिए रे भाई , जैसी नान्ही दूब |
और घास जळ ज्यायसी रे , दूब रहेगी खूब |
फेर सावन कद आवेगा || ३ ||

साईं के दरबार में जी भाई, लम्बी खड़ी खजूर |
चढ़े तो मेवा चाख ले रे , पड़े तो चकनाचूर |
फेर उठण कद पावैगा || ४ ||

जैसे शीशी कांच की रे भाई, वैसी नर के देह |
जतन करंता जायसी रे, हर भज लावा लेय |
फेर मौसर कद आवेगा || ५ ||

चन्दा गुडी उड़ावता रे भाई, लम्बी देता डोर |
झोलों लाग्यो प्रेम को रे, कित गुडिया कित डोर |
फेर कुण पतंग उड़ावणा || ६ ||

ऐसी कथना कुण कथी रे भाई, जैसी कथी कबीर |
जलिया नाही, गडिया नाही रे , अमर भयो शरीर |
पैप का फूल बरसावेगा || ७ ||

तेरे गले को हार जंजीरों रे, सतगुरु सुलझावेगा,
तेरे काया नगर में हीरो रे, हेरे से पावैगा .....

जय श्री नाथजी की............

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श्री गणेश काटो क्लेश, नित् हमेश धंयावाँ थाँने




श्री गणेश काटो क्लेश, नित् हमेश धंयावाँ थाँने

श्री गणेश काटो क्लेश, नित् हमेश धंयावाँ थाँने
अरजी करां दरबार में- मनवा थाने
अरजी दरबार में करता सरकार में, श्री गणेश काटो....!!

दुंद दुंदाला देवा शूँड शूँडाला !
मोटा मूँड लम्बी शूंड भरके दूंद !! ध्यावा थाने.....!!१!!

पुष्पन माला नयन विशाला !
चढ़े सिन्दूर बरसे नूर, दुश्मन दूर !!ध्यावा थाने....!!२!!

रिद्धि सिद्धि नारी देवा, लागै पियारी !
रिद्धि सिद्धि नार , भरया भंडार, सेवा अपार !!ध्यावा थाने......!!३!!

दास मोती सिंह तेरा गुण गावे, गुरू चरणा मे शीश नवावें !
द् यो वरदान, मांगु दान, करो कल्याण !! ध्यावा थाने....!!४!!

बोल गणेश जी महाराज की जय

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कैसे जीतें हैं भला लोग हरी नाम बिना

कैसे जीतें हैं भला लोग हरी नाम बिना
कैसे जीतें हैं भला लोग हरी नाम बिना
उनका जीना नहीं जीना है प्रभु नाम बिना

एक यही नाम तुम्हें पार करेगा भव से
पार हो सकते नहीं इसके सहारे के बिना

जिन्दगी चार दिनों की है गुजर जायेगी
जाना ही होगा अकेले तुम्हे अपनों के बिना

वक्त ठहरा ही नहीं और ना ठहरेगा कभी
हो गयी देर तो पछताओगे सतसंग के बिना

"रामा"कहता है लगन हरी से लगा कर देखो
आयेगा खुद ही जहां में तुम्हे जीने का मज़ा



जय नाथ जी की भाई जी
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ग्वालिड़ा तू कोनी जाने पिड़ परायी


ग्वालिड़ा तू कोनी जाने पिड़ परायी

राग:- सोरठ
ग्वालिड़ा तू कोनी जाने पिड़ परायी
पिड़ परायी रे प्रीत परायी
बेठ कदम पर साँवरो बंसी बजायी जी
(रे मेवाड़ी राणा रे) सब गाय न घिर आयी
चोर चोर दही माखन खायो जी
(रे मेवाड़ी राणा रे) ब्रज की नार डराई

जनमत ही कुल त्यारण कहियो जी
(रे मेवाड़ी राणा रे) मात-पिता , गुरु भाई

राजा माधोसिंह जी रा कुवर प्रताप सिंघजी
(रे मेवाड़ी राणा रे)सब मिल सोरठ गाई

बोल कृष्ण चन्द्र भगवान की जय
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मानो म्हारी बात द्वारका थे जाओ।

मानो म्हारी बात द्वारका थे जाओ।


बोले नारी सुणो पियाजी , मानो म्हारी बात द्वारका थे जाओ।
थे जाओ पिया थे जाओ पूरी द्वारका थे जाओ।।

माल उधारो मिले नहीं पिव,
मुश्किल दाणे दाणे की।

दोय वक्त में एक वक्त बिध लाग थारे खावण की

मीठी निकले भूख पिया थारा दुर्बल हो गया गात द्वारका थे जाओ.......


आन गरीबी आ घेरी बरतण ना फूटी कौड़ी

तन का वस्त्र फाट गया पिव,फाटेडि चादर ओढ़ी

सियाँ मरता फिरो रात दिन दे काख्यां म हाथ

द्वारका थे जाओ......


जाकर भेंट करो प्रभु से मन में काई आँट करो

अपने दिल की बात प्रभु से कहता काई आँट करो

सारी बातां सामर्थ है म्हारो देवर है ब्रजनाथ

द्वारका थे जाओ......


"मोहन"कहे मत भूल प्रभु ने याद करो दो च्यार घडी

लखे चौरासी फिर आयी या चोपड़ गन्दे स्यार पड़ी

"मोहन"कहे या रीत प्रभु की दे दुर्बल न साथ

द्वारका थे जाओ.......


बोल भक्त और भगवान की जय

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